Wednesday, January 7, 2009
राईनर मारिया रिल्के,पेरिस, मई 10, 1911
-एक पत्र-आह, प्रिय प्रिन्सेस, मेरी सुस्ती दिनों दिन इतनी बढ़ती जा रही है कि मैं जाकर तुम्हें अब लिख रहा हुँ. जब मैं यहाँ आया तो बर्फ गिर रही थी. लाईलेक लगभग समाप्त हो चुके हैं. मंजरी मे सफेद और लाल काँटे उग आये हैं. प्रक्रति कितना कुछ कर रही है. लोग कितना कुछ करते हैं. मैं नहीं जानता हुँ कि वे क्या क्या कुछ करते रहते हैं. इतिना जानता हुँ वे खूब व्यस्त दिखते हैं खूब मग्न और सक्रिय. मुझे लगता है वे सब कितनी तरह के काम कर रहे हैं. अपनी-अपनी भूमिकायें अदा कर रहे हैं.--
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